||प्रेमी पंक्षी ||

“बरसा है मनभावन सावन
आज मेरे इस हृदयी उपवन में
प्रेम छटा बिखरी है फिर से
अंधकार मय इस जीवन में,

सुन्दर लाल कपोलों पर
फिर हया की बदरी छायी है
स्नेहल मुस्कान भरे अधरों पे
कुछ प्रेम शब्द खिल आये है ,

हर्षित सा मन आँगन लगता है
कोमल भाव विचारों से
लालसा पागल प्रेमी पन की
उद्विग्नता भरे इशारों से ,

प्रेम का पंक्षी हो आतुर प्रेम में
उड़ चला है फिर प्रेम गगन में
खोज नए उस प्रेम पथिक की
संजोये अपने हृदयी उपवन में ||”

2 Comments

  1. निवातियाँ डी. के. 03/02/2016
  2. omendra.shukla 04/02/2016

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