महबूब:-विजय

मेरी जो मह्बूब है फूल वो गुलाब है,मै तो हू बस एक काटा,पर कांटो से उसे प्यार हैवो कह्ती है,जो तू न होता मेरी क्या औकात है,हर आने-जाने वाला मुझे मसलता,तू ही तो मेरा पहरेदार हैकभी मै सोचू वो कमल है,जो कीचड मे भी पाक हैमै तो हू बस गन्दा कीचड,पर कीचड से उसे प्यार हैवो कहती,औरो के लिए तू कीचड होगा,मेरा तू आधार हैतुम बिन मै कही रह न पाऊँ,तू मेरा घर सन्सार है.कभी है वो रात की रानी,जो महके सारी रात हैमै तो हू बस घोर अन्धेरा,पर अन्धियारो से उसे प्यार हैवो कह्ती औरो के लिए तू होगा अन्धेरा,मेरा तो तू साथी हैरातो को जब सब सो जाए,बस तू ही मेरा हमराही हैवो तो है एक सूर्यमुखी, उसके मुख की क्या बात हैमै तो हूँ एक तपता सूरज,पर सूरज से उसे प्यार हैवो कहती,औरो के लिए तू तपन होगा,मेरा तू अभिमान हैतेरे बिन मै रह न पाऊ ,तू मेरी पहचान है.अब क्या कहु उसके बारे मे,वो तो छूई-मुई सी हैकोई भी छू ले तो शर्मा के मुरझा जाती हैवो कह्ती है,तु तो है पवन का झोका,तुझसे क्या शर्माना हैतु तो मेरे अंग -अंग मे बसता,जब तु मुझको छू जाता है

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10 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 02/03/2016
  2. डी. के. निवातिया 02/03/2016
  3. ANU MAHESHWARI 03/05/2017
    • vijaykr811 04/05/2017
  4. Shishir "Madhukar" 03/05/2017
    • vijaykr811 04/05/2017
  5. डी. के. निवातिया 03/05/2017
    • vijaykr811 04/05/2017
  6. bindeshwar prasad sharma 03/05/2017
    • vijaykr811 04/05/2017

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