घड़ी की टिक टिक

यह घड़ी की टिक टिक
और भागता हुआ समय
जाने क्या कह रहा है

मानो कल कल करता पानी
झरनों से बह रहा है
गुज़रा हुआ रास्ता
कहाँ उसे रोक प् रहा है
गति से बहुत
वोः बहे जा रहा है
ठहरना उसका मुमकिन नहीं
लिए साथ अपने
वोः सब जा रहा है
कभी फूलों. का. संग
उसे. हर्षा रहा है
कभी मिलन पत्थरों का
रास्ता नया बता रहा है
संग जिसका मिला
वोःलिए जा रहा है
बहारें कैसी भी हों
वोः मुस्कुरा रहा है
हर पल हर. लम्हा
कुछ कहे जा रहा है
जीवन भी है झरनों की मानिंद
कभी रुकता नहीं
बस चले जा रहा है

घड़ी की टिक टिक
और भागता समय
हर पल हम से
नज़रें चुरा रहा है
गति से समय
बीता जा रहा है
राज़ ज़िन्दगी. का
शायद बता रहा है

चुरा कर. कुछ पल कभी
हम. खुद. से. पूछतें हैं
छुपा है जीवन
हर पल में. तो
फिर कियोँ हम
ख़ुशी. का पता ढूँढ़ते हैं
अपने आप में है वोः
उपलब्धि एक
छुपी बैठी है वोः
मन में ही कहीं
कहाँ बाहर
उसके निशाँ ढूँढ़ते हैं

7 Comments

  1. Er. Anuj Tiwari"Indwar" 16/01/2016
    • Kiran Kapur gulati 16/01/2016
  2. Kiran Kapur gulati 16/01/2016
  3. Shishir 16/01/2016
    • kiran kapur gulati 16/01/2016
  4. निवातियाँ डी. के. 16/01/2016
    • kiran kapur gulati 16/01/2016

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