तू देख मेरे हुनर को देख

देख ज़िन्दगी को
मेरी नज़र से देख
बिखरे हैं रंग कैसे २
रंगिनिओं कोदेख
नहीं कमी कुछ भी कहीं
जा के आते नज़रों को देख
कहीं झुक रहा है आस्मां
कहीं चमक मेरी तारों में देख

नहीं अछूता मुझ से कोई
बन के पानी बहता हूँ मैं
कभी बनके तूफां
हवाओं को भी. देहलता हूँ मैं
चहचहाट में पंछिओं की
चेह्चहाता हूँ मैं
बादलों को गर्जना
भी सिखाता हूँ मैं
असीम प्रकाश बन
रोशनी फैलता हूँ मैं
चीटिओन् की दुनिआ
भी बसाता हूँ मैं
चिंघाड़ना हाथिओं को
बताता हूँ मैं
छोटे से छोटे कण में
भी समाता हूँ मैं
कभी शिखर हिमालय का
बन जाता हूँ मैं
चाहूँ कभी तो
बादल बन बिखर जाता हूँ मैं
कुछ भी दिखाई देता है जो
देख बनाई मेरी नज़र को देख
कैसे जतन से बनायीं यह कायनात
तू देख मेरे हुनर को देख
बम्ब विस्फोटों पे इतराता है तू
हिला दूँ ज़मीं ज़रा सी तो
फिर देख. मेरे असर को देख
फूलों में मेरी नज़ाकत को देख
समंदर में मेरी ताक़त को देख
देख कभी तू गौर से देख
बसा हूँ हर पल में,हर क्षण में देख
हर उन्चयी में,हर गहराई में
ताक़त मेरी. समाई को देख
तू देख तो बस. मेरे हुनर. को देख

4 Comments

  1. Shishir 09/01/2016
  2. kiran kapur gulati 10/01/2016
  3. निवातियाँ डी. के. 12/01/2016
  4. kiran kapur gulati 12/01/2016

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