गर ये मजबूरी ना होती

गर ये मजबूरी ना होती

महलों में होते
गर ये मजबूरी ना होती
इन झोपड़ियों में ना रहते
चूसते खून आवाम का
हर रोज़ पेट भरकर
ईमानदारी का जामा पहन
किसी को कुछ ना कहते
माना की ये जमीं का टुकड़ा
हमारा नहीं
लोगों ने खरीदा है कानून तक
क्या ये नाइंसाफी की ओर
इशारा नहीं
साहब
कभी महलों की दिवारों पर
तो बुलडोजर चलाओ
कभी नेताओं, भ्रष्टाचारियों के
की भी लाईन में लगाओ
हमें नहीं है मखमल पे सोने
की आदत
अलाव के पास ही रात
कट जायेगी
कभी अमीरों को भी निकालो
घरों से बाहर ठंड में
आपकी सियासी कुर्सी
तक हिल जायेगी
साहब!..!
हम पर बीती है रात भर
तो हर किसी को
अपना दुखड़ा सुनायेंगे
पता है बदनसीब हैं हम
ये सारे नेता
हमारी जलती आत्मा पर
राजनिति की रोटी सेक
चले जायेंगे
किसी गरीब को आँसुओं
में बहते हुए देखना
दिल फट जायेगा तुम्हारा
कभी अपने मकां को ढहते
हुए देखना
हम तो ऐसे ही जिते आये
आसमाँ के नीचे पका लेंगे अपनी रोटी
महलों में होते
गर ये मजबूरी ना होती
by
ALOK UPADHYAY

Alok upadhyay poet

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7 Comments

  1. Er. Anuj Tiwari"Indwar" 01/01/2016
  2. md. juber husain 01/01/2016
  3. krishna dwivedi 01/01/2016
  4. निवातियाँ डी. के. 01/01/2016

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