चाहे मिल जाए जागीरें- शिशिर “मधुकर”

मेरे जीवन का सूरज ढलता है धीरे धीरे
अब हैरां ना करती मुझको ये टूटी तस्वीरें
बिना मुकद्दर काम ना आतीं इन्सां की तद्बीरे
चाहो ना फिर भी पैरों में पड़ जाती है जंजीरे
दिल की चोट का घाव सदा देता रहता है पीड़ा
इसको सहने की आदत डालो सुन लो सब तकरीरें
कुछ लोगों में होती है ताक़त वो बना सकें तकदीरें
इनके हाथों में कोयले के टुकड़े भी कहलाते हैं हीरे
कान्हा ने जब रास रास रचाया कालिंदी के तीरे
वैसी ख़ुशी नहीं मिलती चाहे मिल जाए जागीरें.

शिशिर “मधुकर”

7 Comments

  1. omendra.shukla 28/12/2015
  2. Shishir "Madhukar" 28/12/2015
  3. निवातियाँ डी. के. 28/12/2015
    • Shishir "Madhukar" 28/12/2015
      • निवातियाँ डी. के. 30/12/2015
  4. Uttam 29/12/2015
  5. Shishir "Madhukar" 29/12/2015

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