इंदु अपरिचित

इंदु मिलन की सीर बस एक
विरह के पाहन अनगिनत वहाँ
संकरे मार्ग, अनभिज्ञ दिशा
अनुभूति हुयी थी स्वर्ग की जहाँ

दोष एक मात्र बलिदान और प्रेम
अक्सर ये रास्ते कठिन होते है
कोई क्यों काट के ले जाये फसल
जिसको कृसक उम्मीद से बोते है

सब कुछ पर्याप्त मात्रा मे
फिर भी क्यों कोई अकेला है
खुद डूबा रहा माँझी नौका को
क्यों जीवन को फिर वहाँ धकेला है

उस स्पर्श के पुष्प आज भी ताजा है
जब की आज किसी और बंधन मे हूँ
स्मरण करोगे कुछ पंखुड़िया चढ़ा देंगे
फिर प्रतीत होता, आज भी अभिनन्दन मे हूँ

वो सागर की मिटटी, और तुम्हारा नाम
वो वायुमार्गो के अदृस्य चिन्ह
विश्वास जल तरंगो पर
वो प्रेम क्रीड़ा भिन्न भिन्न

द्वितीय तल पर सखी का निवास
नगण्य प्रेम विचारो का आह्वाहन
वो साहित्य का जन्म मन मे
और जीवन धारा थी पावन

तुलना करना तो है असंभव
उनको लिखने को शब्द अभाव
जीवन देता है जो भी मुझे
प्रस्तुत करता हूँ उनका प्रभाव

अपरिचित क्यों हो गए फिर हम
एक फिर कोशिश, एक प्रयास
कुछ फूलो से प्रेम सींचने
कोई विकल्प नहीं फिर सन्यासः

2 Comments

  1. omendra.shukla 28/12/2015
  2. MK 29/12/2015

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