ठंड रख! माँ कहती थी

जीवन के उन मुश्किल दिनों में
जब चारों ओर थी आग ही आग
अंगारों के अथाह समंदर पर
निराशा की आंधियां बहती थी

ठंड रख! माँ कहती थी

यौवन के उस उफान में
बढती तमन्नाओं के पहाड़ तले
मूल्यों के बौनी होती परछाई पले
नन्ही खुशियां कितना संघर्ष करती थी

ठंड रख! माँ कहती थी

चंचल हिरनी सा फुदकता मन
हर खुशबु पर फिदा हो भ्रमर बन
मरीचिका का वो प्रेम भुवन
जब हर कलि आकर्षित करती थी

ठंड रख! माँ कहती थी

कठोर परिश्रम के पश्चात भी
आंखों में स्याह करते रात भी
चोटियों से फिसलते पैर
तिरस्कार के कोडे सहती थी

ठंड रख! माँ कहती थी

समाज को घेरे अराजकता का धुआं
साँसें घोटती भ्रष्टाचार की वादियों में
क्रांति के ज्वालामुखी से फिर
परिवर्तन की हवा बहती थी

ठंड रख! माँ कहती थी
रिश्तों में बढते तनाव के बीच
मशीनी जीवन में व्यस्तता को सींच
द्वेष और ईर्ष्या की तलवारें खींच
मतलबी खून की गंगा बहती थी
ठंड रख! माँ कहती थी

7 Comments

  1. Shishir 21/12/2015
    • Uttam 25/12/2015
  2. Raj Kumar Gupta 21/12/2015
    • Uttam 25/12/2015
  3. निवातियाँ डी. के. 22/12/2015
    • Uttam 25/12/2015
  4. Manjusha 27/12/2015

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