निर्धन की अंतरात्मा–पं.राजन कुमार मिश्र।

मैं रोया, फिर हँसा।
जो अजीब सी दुनिया में फँसा।

माएँ सोती है भूखे पेट,
बच्चे सोते है रो के भर पेट।
क्या विरासत में मिली है इन्हें ये भेंट।

क्यूँ ऐसी जिन्दगी देती है मुकद्दर,
जीते है हम जानवरों से भी बदतर।
यहाँ वहीं लोग है सिकन्दर,
जिन्होंने लूटा हमें बना के बंदर।

झूठी इनकी पहचान, झूठे इनके अरमान।
चंद लोगों में बन बैठे है मेहमान।
ज़रा इनकी मेहरबानी देखो,
कहते है आओ हमसे सीखों।

हमें बना दिया हालात का मारा,
खुद बन गया लाखों का सितारा।
मानो अब उसे भी खुशी मंजूर नहीं,
फिर क्यूँ लिखी दास की दस्तूर नई।

मैं रोया, फिर हँसा।
जो अजीब सी दुनिया में फँसा।

—पंडित राजन कुमार मिश्र।

2 Comments

  1. asma khan 15/12/2015
    • Rajan 15/12/2015

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