आसमान भी रोया है -शिशिर “मधुकर”

निज हित साधन की खातिर जब दुनियाँ सच को ठुकराती है
अपना रोष प्रकट करने को कुदरत तब रौद्र रूप दिखलाती है
अपने स्वार्थ सिद्ध करने को हमने धरती को कितना लूटा है
तभी केदार और चेन्नई में मेघों का बाँध सब्र का टूटा है
बिन सोच समझ के इंसा ने यहाँ पर इतनी भीड़ बढ़ा डाली
इनके पापों को धो धो कर कई नदियां तो बन गई हैं नाली
मानव निर्मित धूएं के बिन अब जीवन की नाँव ना चलती हैँ
अक्सर इसके कारण यहाँ इंसा को प्राण वायु ना मिलती हैँ
जनहित के सब काम हो जल्दी यहाँ ऐसी ना कोई नीति हैँ
कौन करेगा अब परिवर्तन बस इस सोच में रातें बीतीं हैं
नियम तोड़ कर जश्न मनाने वालों की तो यहाँ भरमार हैँ
बाकी जनता उनके कर्मों के आगे केवल होती लाचार हैँ
राष्ट्र निर्माण का काम हो रहा ऐसा तो कहीं ना लगता है
तब भी जनता का सर कुछ परिवारों के आगे झुकता हैँ
आस्तीन के सांपों ने मिलकर यहाँ ऐसा विष डंक चुभोया हैं
देख दुर्दशा भारत की पीड़ा में अब ये आसमान भी रोया हैँ

शिशिर “मधुकर”

9 Comments

  1. निवातियाँ डी. के. 11/12/2015
  2. Shishir "Madhukar" 11/12/2015
  3. Manjusha 11/12/2015
  4. Shishir "Madhukar" 11/12/2015
  5. Raj Kumar Gupta 11/12/2015
    • Shishir "Madhukar" 12/12/2015
  6. asma khan 12/12/2015
  7. Shishir "Madhukar" 12/12/2015
  8. Onika Setia 01/04/2016

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