ईश्वर की तुम परछाई हो

मेरे दिल के दूब पर तुम ओस सी छाई हो
सरसों के खेत में जैसे सोने से नहाई हो

हर शाम क्यों मदहोश करती है मुझे इतना
जुल्फों को झुका कर जैसे तेरी कोई अंगड़ाई हो

तुम्हारे जुल्मों का हिसाब नहीं मिलता आजकल
हर जुल्म पर तुम इतनी दुआ जो कमाई हो

तेरे खयालों में लिए आंहों से गर्म हैं मेरी साँसे
जीवन की सर्द रातों में जयपुर की वो रजाई हो।

इस कदर रूठा ना करो कि आंखों के जाम फूट जाएँ
जिंदगी मौत से मिलती हो एसे जैसे कोई बेवफाई हो।

तेरे प्यार का खुमार तो बढ़ – चढ़ रहा है रात दिन
गर्दिश में पड़ी जिन्दगी पर छाई जैसे महंगाई हो।

सुकून की खोज में आवारा बन भटक रहा हूँ दर दर
बस तेरे प्यार की तलाश है, जो तुम कहो हरजाई हो

तुम्हारे प्यार की उष्नता से विरह का बादल बना हूँ मैं
दूर पर्वतों पर कहीं मेरे वियोगी दिल की तुम तनहाई हो

नजरें झुकी रह जाती है सूरज से तेज़ तेरे हुस्न के आगे
प्रार्थना करता हूँ मिलन की इस कदर, ईश्वर की जैसे तुम परछाई हो।।

4 Comments

  1. Girija 27/11/2015
    • Uttam 27/11/2015
  2. asma khan 27/11/2015
  3. निवातियाँ डी. के. 27/11/2015

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