शाम ढल रही है ….

नीलगगन की छाओं में शाम ढल रही है
तारो का आँचल ओढ़े रात सज रही है !!

हुआ जाता आसमा का धरती से मिलन
शरमा के संध्या सागर में मिल रही है !!

रात के अँधेरे अब किनारे ढूंढने लगे है
मध्यम मध्यम दीपो को लौ जल रही है !!

आलम जाने कैसा होगा आज की रात का
हर तरफ उजाले की चहल कदमी बढ़ रही है !!

जैसे शर्म से नजरे चुराकर सूरज चला
अब चाँद की चांदनी जमी पे ढल रही है !!

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@___डी. के. निवातियाँ [email protected]

12 Comments

  1. omendra.shukla 20/11/2015
    • निवातियाँ डी. के. 20/11/2015
  2. Shishir 20/11/2015
    • dknivatiya 20/11/2015
  3. asma khan 20/11/2015
  4. dknivatiya 20/11/2015
  5. Girija 21/11/2015
    • निवातियाँ डी. के. 21/11/2015
  6. Bimla Dhillon 21/11/2015
    • निवातियाँ डी. के. 22/11/2015
  7. Manjusha 22/11/2015
    • निवातियाँ डी. के. 22/11/2015

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