प्रायश्चित

पथरीले पहाड़ों के ऊपर
जमीन से थोड़ा हटकर
पेड़ों की डाली को नंगा कर चुके
सूखे पत्ते गिर गिरकर
धूप के टुकड़ों के बीच
कल्पनाओं के दोराहे में
कह रहे एक नई कहानी,
पेड़ों की सूखी डाल में
पतझड़ का अटका हुआ पत्ता
असमय बदलती ध्वनियां
मिट्टी से खिलवाड़ करती
खोखली जड़ों से गुजरती चीखें
कभी हंसते कभी रोते कहती
ऐसी भी क्या जल्दी है?
पेड़ों की फैली शाखाओं में
पक्षियों के लटकते घोंसलें
पीछे छुपी विशाल क्षृखलाऐं
बर्फ की टूटती दीवारें
सूखी धनी धास पर लुढ़कते
चोट खाते पत्थर बोल रहे
आते गुजरते कर लेने दो
प्रायश्चित।

………………… कमल जोशी

2 Comments

  1. नवल पाल प्रभाकर 13/11/2015
  2. Shishir "Madhukar" 13/11/2015

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