हिन्दी तुझे

हिन्दी तुझे

क्या सोचती है
मैं अकेला निहत्था
इस संसार से लड़कर
तुझे डुबते हुए
अथाह सागर से
हाथ पकड़ बचा लूंगा
कहां है मुझमें वो दम
और कहां में साधूं
वो कपाल भाति
रोक सकूं सांसे जिससे
समुद्र के लवणीय पानी में
फिर तु भी कहां
तैर रही है।
इस गहरे सागर की
लम्बी चौड़ी गोद में
चैन की नींद
सो रही है।
इतनी गहराई तक
मैं स्वयं पहंुच जाऊं
ये मेरा औचित्य नही है।
माना किसी तरह से मैं
जो तेरे पास
पहंुच भी जाऊं
फिर उल्ट पैर मैं
आ ना पाऊं
सांसे हो जायेंगी
समुद्र का उपहार मेरी
विलीन हो जाऊंगा
समुद्र में मैं
मिट जायेगी मेरी हस्ती
रहेगी पिछे सिर्फ मेरी
चंद बचपन की यादें
ओर गूंजती किलकारियां।
-ः0ः-

3 Comments

  1. Ashita Parida 13/11/2015
  2. नवल पाल प्रभाकर 13/11/2015
  3. निवातियाँ डी. के. 13/11/2015

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