अपरिपक्व प्रेम की गाथा : प्रेम एकांकी जुलाई २००२

मेरे जीवन की आस तुमसे
मेरे दिल की हर प्यास तुमसे

पिछले जन्म मे अवश्य होंगे
हम परस्पर जीवन साथी
तन्हा न जीना है गवारा
पर न दुश्मन जान जाती

अदृश्य तारो से बंधा है
रिश्ता मेरा है खास तुमसे

क्यों मिलाया ये पालनहार
जब दूर रखने थे पिया
पर्वतो से पल हुए है
जीवन कैसे जाये जिया

सच रहे रिश्ते में शास्वत
निगाहो से हुई थी बात उनसे

जो समय बीता साथ तेरे
वो वजह है जीने की मेरे
मे अभागी लौटा न सकी
वो आज भी सीने मे मेरे

तेरी वफाई के बदले
मैंने किया ब्योघात तुमसे

मुझे श्रृंगार का तोहफा और
तुमको डुबाया बियोग मे
एक सोच बदले जीवनको
अब तुम नहीं संयोग में

वो समय का एक फेर था
हमें लगा ये है संताप तुमसे

वो रक्त बहता ही गया
वो सांस छिनती ही गयी
कुछ न मेरे बस था तब
तेरे दृस्टि के मोती बिनती rahi

आस पास तुम रहो मेरे दिए के बुझने तक
एक आखीरी बस यही है आश तुमसे

3 Comments

  1. नवल पाल प्रभाकर 10/11/2015
    • mahendra 17/11/2015
  2. [email protected] 16/01/2020

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