“दिल “

“मै चंचल हु, मै कोमल हु
लोग मुझे समझ पाये ना
धडकू मै तुम्हारे लिए हर पल
लोग समझ ये पाये ना ,

खुद में समेटे भावो का संसार
संवेदनशील बनाता हु
ख़ुशी-ख़ुशी सब तिरस्कारों को
सहज ही मै अपनाता हु ,

खुशियों का संसार लिए
प्रिय मिलन को मै तरसू
और वियोग में हर पल
फिर उसके मै तडपू,

समझू रिश्तों की प्रगाढ़ता को
प्यार भरु सबके जीवन में
बदनाम मुझे लोग करते है
भरके नफरत खुद के मन में .||”

4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 05/11/2015
  2. निवातियाँ डी. के. 05/11/2015
  3. SUHANATA SHIKAN 05/11/2015
  4. omendra.shukla 06/11/2015

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