सब कुछ सूना।

सब कुछ सूना।

नदी का किनारा सूना-सूना
तेज धूप, जलता धूना।
पेड़ स्थिर, पक्षी हैं शांत
मन में विचारों का चूना।
ये पक्षी आज अविकल से
तरू खडे़ हैं अविचल से
हवा की सांय-सांय भी चुप
अन्य जीव भी विकल-विकल से
उड़ती धूल भी जम गई
ठोकर लगती तो उड़ती थी।
मगर आज जैसे इसने
जकड़ लिया बाहों में अपनी
धरती मां के आंचल को
ओर आज ये सहमी-सी
डर रही है शायद ये
आने वाली विपत्ति से
वो विपत्ति आ सकती है
किसी भी अनोखे रूप में
इसी में निमग्न हो
प्रकृति ओर संध्या दोनों
एक जगह बैठ किनारे
नदी के शांत बहाव से
आपस में बतिया रही हैं
इन सबकी बातें सुन-सुन
सुनी सांझ बढ़ी जा रही है।
-ः0ः-

2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 05/11/2015
  2. निवातियाँ डी. के. 05/11/2015

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