कवितांए ओर दहेज

कवितांए ओर दहेज

मैं भी कितना मूर्ख
आपको पैदा किया
पाला-पोषा बड़ा किया
पर अब रोना है आता।
जब आपको अपने
अपने कांधे से बड़ा हूं पाता।
आपकी जवानी मुझे
अन्दर से निचोड़ है देती
सारी ममता हृदय में जो थी
आंखों के रास्ते बाहर है आती।
पर मैं कर भी क्या सकता हूं
जब तक कोई वर ना लायक मिले
ऐसे किसे मैं सौंप दूं
मन है मेरा दुविधा में
आप तो शर्माषर्मी कहती नही
पर मैं भी क्या अंधा हूं।
जो इतना भी ना देख सकूं।
कि मेरी इतनी सारी जवां बेटियां
बैठी हैं वर्षों से घर में
इनकी जवानी धीरे-धीरे
लुप्त सी होती जा रही है।
चेहरे की लालिमा भी अब तो
फिकी जैसे पड़ने लगी है।
पर मुझे तुम माफ करो
मैं लाचार हूं, कुछ करूं कैसे
मैं बेकार हूं, कुछ कर नही सकता
यही तो दुराचार है।
-ः0ः-

2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 05/11/2015
  2. निवातियाँ डी. के. 05/11/2015

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