“प्यार”

पहली ठोकर ने मुह के बल गिराया
दर्द पुराना होने तक महसूस किया
दूसरी ठोकर ने सर खोल कर रखा दिया
होश आने तक जिंदगी हवा हो गई थी
तीसरी ठोकर ने आत्मा को रुला दिया

दुबारा न गिराने का इरादा कर
सोचा पत्थर ही हटा दे

पत्थर को जो देखा
दिल ने कहा, चलो फिर
ठोकर खाते है

क्योंकि उस पत्थर का नाम
“प्यार” था

11 Comments

  1. omendra.shukla 29/10/2015
    • Rinki Raut 29/10/2015
  2. निवातियाँ डी. के. 29/10/2015
    • Rinki Raut 29/10/2015
  3. Shishir "Madhukar" 29/10/2015
    • Rinki Raut 29/10/2015
  4. Shyam 30/10/2015
  5. Rinki Raut 30/10/2015
  6. SUHANATA SHIKAN 02/11/2015
  7. Jain 02/11/2015

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