एक गरीब चाह

एक गरीब चाह
जी रहा था निर्जन
मन के किसी कोने में
बंजर मन का राजा था वह तो
फल-फूल रहा था अकेले ही
क्या पता था पतझड़ भी शीघ्र आता होगा

नवीन जीवन से प्रेरित
जीवन संग्राम में जूझ गई
वह निर्बल लघु चाह फिर से
आशा का पताका लहरा उठा, मगर
विद्रोह हुआ विजय के विरुद्ध
कुचली गई उस चाह की जिंदगी

3 Comments

  1. Girija 28/10/2015
  2. निवातियाँ डी. के. 28/10/2015
  3. Shishir "Madhukar" 28/10/2015

Leave a Reply to निवातियाँ डी. के. Cancel reply