प्राण

हे भगवान!
इनसान
आज ढूँढते हैं अपने प्राण
हे भगवान!

सुख चैन ढूँढते
उस खुशहाल गांव के
ग्रामीणों की तरह
जो आने के एक दुष्ट जादूगर से
हो गए हे बेचैन, परेशान
इनसान
आज ढूँढते हैं अपने प्राण
हे भगवान!

उस राजकुमार की तरह
जिसने बंधाई ग्रामीणों की उम्मीद
जो करेगा दुष्टता का अंत
देगा पुनः चैन की नींद
लौटेगा उनका सम्मान
इनसान
आज ढूँढते हैं अपने प्राण
हे भगवान!

उन ग्रामीणों और राजकुमार की तरह
जो हैं हैरान
जादूगर तो चित्त है चारों खाने
फिर भी हँसता है, कैसै जाने?
“मरणासन्न हूँ! मार नहीं पाओगे
दूर देश बसे तोते में रखे हैं मेरे प्राण
तुम कैसे पहुँच जाओगे”
हे भगवान!

कहानी ने याद दिलाया
प्राणों को दाना बना
अपने परिंदों को खिलाया
परिंदों की ऊँची उड़ान

हे भगवान!
इनसान
आज ढूँढते हैं अपने प्राण
हे भगवान!

7 Comments

  1. Girija 28/10/2015
  2. निवातियाँ डी. के. 28/10/2015
    • Girija 28/10/2015
  3. ektatiwari112 28/10/2015
    • Girija 28/10/2015
  4. Shishir "Madhukar" 28/10/2015
    • Girija 29/10/2015

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