“प्रकृति की आधुनिकता “

नहीं दीखता अब पुष्पों का बाग
कलियों की मुस्कान कहा अब
भौरे गुंजार नहीं करते अब
शायद पुष्प भी आधुनिक हो गए है अब ..

बागों में ना वो शांत सुर अब
जो चित्त को एकाग्र किया करते थे
ना रहीं अब वो सोंधी सी महक
जो मन को खुश कभी किया करती थी ..

ना तितलियाँ अब पुष्पों पे दिखती है
ना पवन पुरवईयां अब बहती है
नदियों का वो शीतल जल
नहीं आर्द्र हवाओं को करती है ….

4 Comments

  1. swati 28/10/2015
  2. omendra.shukla 28/10/2015
  3. निवातियाँ डी. के. 28/10/2015
  4. omendra.shukla 28/10/2015

Leave a Reply