“बसाके हिय में झूठे प्रेमलोभ को, मातृप्रेम को हम बिसराते है….”

क्या थे ? क्या हम होगये ?
सपनो में अपने ही खो गए
आधुनिक बनने की चाह में
संस्कृति को अपनी खो गए …

लज्जा का बस नाम आज है
लज्जा रहीं ना अब शेष है
भारत बनता अपना अंग्रेज है
और अंग्रेज बनते अब यह देश है

कर रहे अनुकरण हम पश्चिम का
छोडके अपनी संस्कृतियों को
पर शायद भूल रहे हम एक पल को
सूर्य हुआ है अस्त सदा पश्चिम को

आधुनिकता की कैसी यह परिभाषा
लिखी है हम युवाओं ने
बीबी बसती है दिल में कहीं पर
और माँ पलटी है वृद्धाश्रमों में

खातिरदारी होती ससुरालवालों की
और बाप को मिलती गलियां है
पैरों में झुकती बहने है
और गले में झूमती सालियां है

सुंदरता बसती है अर्धनग्नता में
पुरे परिधानों में अब लज्जा दिखती है
अंतःवस्त्र से झांकते दारणों में
आधुनिकता सदा हमें दिखती है

अठ्ठार में अब शादी पर
जीवन को खतरा दिखता है
पर अल्पायु में सम्बन्धो पर
जीवन रस नया मिलता है

मातृदिवस का पता नहीं
पर प्रेमदिवस को हम अकुलाते है
बसाके हिय में झूठेप्रेमलोभ को
मातृप्रेम को हम बिसराते है….”

6 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 23/10/2015
  2. omendra.shukla 23/10/2015
  3. निवातियाँ डी. के. 23/10/2015
  4. omendra.shukla 24/10/2015
  5. Hemchandra 25/10/2015
  6. omendra.shukla 26/10/2015

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