“तुम”

तुझे बंधनों में बाँधू
ऐसा कभी चाहा नही
तुझे अपने तक सीमित रखूं
ऐसा कभी हुआ नही
फिर भी तुझ से कुछ कहना है-
मेरे कृतित्व के गौरव विराट
तू मुझ पर है ईश्वर का हाथ
तू सब कुछ करने में सक्षम
मैं तेरा अविभाज्य
फिर क्यों रहूँ असक्षम
तेरे चेहरे की निश्च्छलता
मेरे जीवन की उज्जवलता
मेरे जीवन के हास
मेरी सांसों की आस
कुछ नूतन करने की आशा
दें तुझे कभी निराशा
नीड़ उन्मुख खगों के दल
सीखाएं जीवन की परिभाषा
अस्त संग उदय,हार संग जीत
यही तो है जीवन प्रत्याशा

“मीना भारद्वाज”

4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 20/10/2015
    • Meena bhardwaj 20/10/2015
  2. निवातियाँ डी. के. 20/10/2015
  3. Meena bhardwaj 20/10/2015

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