अपनेपन की गंगा- – शिशिर “मधुकर”

जिनके अंदर सच्ची श्रद्धा और प्रेम का दीपक जलता है
ऐसे सीनों से लगने में एक सुख अजीब सा मिलता है
पूरे जीवन हर इंसा को जिस चीज की इच्छा रहती है
अपनेपन की वो गंगा तो इन सब जिस्मों में बहती है
इसकी धारा को रोक के तुम कुदरत से यूँ टकराओ ना
प्रेम के प्यासे हर मानव को आपस में गले मिलाओ ना.

शिशिर “मधुकर”

8 Comments

  1. SUSHIL 18/10/2015
    • Shishir "Madhukar" 18/10/2015
  2. dknivatiya 18/10/2015
  3. Shishir "Madhukar" 19/10/2015
  4. Uttam 19/10/2015
  5. आमिताभ 'आलेख' 19/10/2015
  6. Saleem Ahmad 28/10/2015
  7. Shishir "Madhukar" 28/10/2015

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