अंतर्मन की आवाज

गूँज जाती है हवाओं में हल्की इसकी चाप भी
छिन जाता है अनायास ये मन उधर अपने आप ही

भले कह लें दस्तक दर पर,बसा यह मन ही में है
विवेक के विरुद्ध जो चले, जाता है दिल काँप भी

कितने जुल्म छिप सकेंगे सब्र के कफन तले
चुभा हो खंजर दिल में, पडती है छाप भी

इस दस्तक के डाक से रहे न हम अजनबी
जीवन की किसी राह पर हुआ था आलाप भी

उमंग उद्वेलित सृजन मन में आनंद का उद्गम तभी
लहर लहर से बन पड़ा सागर का नाप भी

3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 16/10/2015
  2. निवातियाँ डी. के. 16/10/2015
    • Uttam 16/10/2015

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