मोहब्बत के अशआर

इतना मैं डूब चुका, मोहब्बत के समंदर में।
हर शख्श मुझे अब तो, मेरी जान सा लगता है।

सब तेरी इनायत थी, जो संग वक्त बिता पाया।
अब तुझे देखना भी, अरमान सा लगता है।

जिन्दा हूँ अब तक मैं, तेरी सूरत देखे बिना।
आईने का शख्श मुझे, बेईमान सा लगता है।

जी रहा हूँ लेकिन मैं, अब बीत चूका सारा।
गम भी मुझपे खुलकर, मेहरबान सा लगता है।

चल रही लाश पैरों पर, इक पागल आशिक की।
इसे देख मोहब्बत पर, गुमान सा लगता है।

वो नजरे मिलायीं थी, जो पहली दफा तुमने।
वो मसला भी मुझको, क़त्ल-ए-आम सा लगता है।

मंदिर में गया था पर, मांग ना पाया कुछ।
वो शख्श भी मुझको तो, बेजुबान सा लगता है।

बेच रहा हूँ अब, दिन-रात मैं गा-गाकर।
जेहन जज्बातों की, दूकान सा लगता है।

सब शिकवे तुमसे नहीं, तेरे छोड़ के जाने पर।
मुझे संगीन मेरा अपना, गिरेबान भी लगता है।

राकेश जयहिन्द।

4 Comments

  1. आमिताभ 'आलेख' 09/10/2015
  2. अर्पण 09/10/2015
  3. निवातियाँ डी. के. 09/10/2015
  4. Shishir "Madhukar" 09/10/2015

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