कच्चे धागे

कच्चे धागों सा प्यार तुम्हारा, बस इतना समझ में आया।
कश्मकशे न रखीं थी फिर भी, प्यार से प्यार निभाया।

वो वक्त भी तुमको गवारा था,
जो मेरे बिना ही गुजारा था।
लिख-लिखकर गजलें तुम्हारे लिए,
मैंने पल-पल तुमको संवारा था।

जो भी लिखा मैंने उस पल, सब तेरा तुझको सुनाया।
कश्मकशे न रखीं थी फिर भी, प्यार से प्यार निभाया।

इनकार था दिन में निकलने का,
बस इंतज़ार अँधेरा गिरने का।
शाम ढली, मैं गया तो बोली,
ये वक्त है क्या कोई मिलने का।

कुंठित बहुत हुआ था पर, चुपचाप वहाँ से लौट आया।
कश्मकशे ना रखीं थी फिर भी, प्यार से प्यार निभाया।

राकेश जयहिन्द

14 Comments

  1. राकेश जयहिन्द 05/10/2015
    • राकेश जयहिन्द 05/10/2015
  2. Er. Anuj Tiwari"Indwar" 06/10/2015
    • राकेश जयहिन्द 06/10/2015
  3. Shishir "Madhukar" 06/10/2015
    • राकेश जयहिन्द 06/10/2015
  4. jai 06/10/2015
    • राकेश जयहिन्द 06/10/2015
  5. Uttam 06/10/2015
    • राकेश जयहिन्द 06/10/2015
  6. निवातियाँ डी. के. 06/10/2015
  7. आमिताभ 'आलेख' 09/10/2015

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