दर्पण

कई चहरे उभरेंगे तुमसे
झाँक कर देखो दर्पण में
गहराई कितनी आत्मा की
नाप कर देखो जीवन में

कतरा कतरा बिखर जाएगा शब्द
मानवता के विद्रोह में
डर रहा कतरा कोई
बीज न बन जाए अबोध मन में

प्रतिबिम्बों को पहचानो
अन्तर्मन को तुम जानो
साँसों से रिश्ता खो रहे
तुम हर छण में

विरह में तृप्ति के
तडपो न जीवन में
मिलन का आनंद भव्य हैं
विशद किसी सृजन में

फलता है प्रेम पुष्प
समाज के सुरभित आँगन में
है मनोवांछित समता का निर्माण
सुदृढ़ सजग जनगण मे

5 Comments

  1. राकेश जयहिन्द 06/10/2015
    • Uttam 06/10/2015
  2. Shishir "Madhukar" 06/10/2015
  3. Uttam 06/10/2015
  4. निवातियाँ डी. के. 06/10/2015

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