खत्म

सूरज की गरम रोशनी
हवा का अपनापन
फूलो की खुशबू का साथ
सब पहले जैसा है
कुछ तो खत्म नहीं हुआ
बिखरे सपनों की आंच
सूखे कुएं सी प्यास
ठण्ड में ठिठुरती हंसी
रात में चांदनी सा जगता प्यार
खत्म होने सा सवाल ही नहीं
बनता

तो तुम्हे क्यूँ लगता है
तुम्हारा जाना
मेरे सब कुछ खत्म कर सकता है

तुम्हारे जाना से क्या?
हमें बंधने रखने वाला एहसाह
नहीं रहा
चहरे दर चहरे में तुम्हे देखने की
तेरी आहट सुनाने की
चाहत तो खत्म नहीं हुई

रिंकी राउत

6 Comments

  1. निवातियाँ डी. के. 05/10/2015
    • Rinki Raut 06/10/2015
  2. Shishir "Madhukar" 05/10/2015
    • Rinki Raut 06/10/2015
  3. राकेश जयहिन्द 06/10/2015
  4. Rinki Raut 06/10/2015

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