दुःख से अब घबराना कैसा -शिशिर “मधुकर”

दुःख से अब घबराना कैसा
दुःखमय तो ये जीवन है
सुख दुःख को महसूस करे जो
केवल मायावी मन है
भगवद् की इस दुनिया में
कोई भी पूरा सुखी नहीं
इंसानो की बात ही क्या
प्रकृत भी इससे बची नहीं
रोज़ समय के साथ चाँद भी
देखो घटता बढ़ता है
सूरज के भी तेज को आखिर
बादल आकर ढकता है
तेज़ पवन बादल को अपने
साथ उड़ा ले जाती है
उसकी ताकत को पर्वत की
ताकत से टकराती है
पर्वत से टकराकर देखो
बादल से बरसा जल है
दुःख से अब घबराना कैसा
दुःखमय तो ये जीवन है
सुख दुःख को महसूस करे जो
केवल मायावी मन है

शिशिर “मधुकर”

6 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 07/10/2015
  2. राकेश जयहिन्द 07/10/2015
  3. Shishir "Madhukar" 07/10/2015
  4. निवातियाँ डी. के. 07/10/2015
  5. Shishir "Madhukar" 07/10/2015

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