फिर बने हिंदी हिंदुस्तान का गौरव , इस उम्मीद में जीती हु मै

छूटी हु मै ,आज फिर से रूठी हु मै
अपनों से ही अब टूटी हु मै
निज सम्मान त्याग आज
फिर गौरव को भूखी हु मै
बदले है परिधान यहाँ
और बदला है हर इंसान यहाँ
वजह यही शायद बदला है ईमान यहाँ
तलाश में खोये सम्मान को
उम्र गुजार रही हु मै
छूटी हु मै ,आज फिर से रूठी हु मै
अपनों से ही अब टूटी हु मै ……
ढूंढ रही हु फिर कोई तुलसी
या सुर कहीं कोई मिल जाय
भ्रमित आज के नवयुवकों को
तारणहार कोई मिल जाय
खोती लाज बचाये मेरी
और वापस बिता मान दिलाय
उम्मीद के इन्ही सपनों में
आज फिर से खोयी हु मै
छूटी हु मै ,आज फिर से रूठी हु मै
अपनों से ही अब टूटी हु मै ….
दफ्तरों में परिहास बनी मै आज
अपनों के लिए ही हास्य बनी मै आज
उगता है सूरज रोज कहीं ,
चांदनी निराली होती है कहीं पे
पर अस्त हुए इस सूरज के
उगने की उम्मीद में जीती हु मै
फिर बने हिंदी हिंदुस्तान का गौरव
इस उम्मीद में आज फिर जीती हु मै
छूटी हु मै ,आज फिर से रूठी हु मै
अपनों से ही अब टूटी हु मै ……….

2 Comments

  1. Anuj Tiwari"Indwar" 11/09/2015

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