मेरी शामत (हास्य कविता )

सब्जी लेने के बहाने, देखने को जिसे जाते थे बाजार में
लगता था पड़ जाएगे उसके इक तरफा पयार में
माथा घूम गया मेरा, और वो तो इक अजीब पहेली निकली
बीवी संग बाजार जान पर पता चला, की वो उसकी सहेली निकली

पहले कभी एक दो बार उसको देख कर मुस्कराया था
आज उसी बात को लेकर मेरा माथा चकराया था
डर लग रहा था , कहीं वो मेरी चुगली न कर दे
अच्छी भली चल रही लाइफ में ऊँगली न कर दे

मेरी बीवी के कान में वो कुछ फुसफुसाई
मैंने मन में सोचा, बेटा हित तेरी शामत आई
फिर ज्यों ही मेरी बीवी ने देखा मुझे घूरकर
और मैं अपने आप से बोला बेटा तू और कसूर कर

इतने में पत्नी ने गुस्से से बोला, सब्जी लो और घर चलो
और जाने से पहले , दो किलो करेले आज फालतू ले लो
घर पहुँच कर बोली -आज करेले की ही सब्जी बनायुंगी
तुम्हे पसंद नहीं इसीलिए 3 दिन तक ये ही खिलाऊँगी

दूसरी औरतों को ताड़ते हो , जबकि हो गए हो चालीस क पार
आज के बाद छीन लुंगी तुम से सारे अधिकार
तुम्हे सुधारने के लिए मै अच्छी पत्नी का फ़र्ज़ निभाऊंगी
और अगले रक्षाबंधन पर उसी से तुम्हे राखी बँधवाऊंगी

हितेश कुमार शर्मा

3 Comments

  1. निवातियाँ डी. के. 04/09/2015
  2. nitesh singh 06/09/2015
  3. Hitesh Kumar Sharma 07/09/2015

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