एक बहस – ख़लिश ( पीड़ा ) के नाम …

ख़लिश हर वक़्त दरवाजे पर दस्तक देने को तैयार है
पर मैं भी ज़िद्दी …उससे डट कर सामना करने को तैयार हूँ…
उसे हार मंजूर नहीं तो मुझे भी हमेशा जीतने की आदत है..
ये अहंकार नहीं मेरा आत्मविश्वास है…..
उसके पास अगर परेशानियों का काँटा है
तो मेरे पास भी उसका सामना करने के लिए हिम्मत के फूल….
अए ख़लिश ! मुझे तुच्छ समझकर न कर तू भूल…..
तुझे गम की बरसात बरसाने की आदत है
तो मुझे ख़ुशी की छतरी खोल उसे रोकने की….
तुझे रुकावटों का अन्धकार पसंद है तो
मुझे हर वक़्त आगे बढ़ने का दीप जलाना पसंद है
जब तेरी और मेरी आदतों में कोई समानता नहीं
तो मेरी ज़िंदगी से तेरा कोई ताल-मेल नहीं….
तू जितनी भी कोशिश कर ले ख़लिश
पर हर वक़्त उम्मीदों के दीये से
तेरे नापाक इरादों के अंधकार को मिटा
अपनी जीत की ज्वाला प्रज्वलित करुँगी …..

2 Comments

  1. Anuj Tiwari"Indwar" 01/09/2015
  2. निवातियाँ डी. के. 02/09/2015

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