इतने भी हम सयाने न थे

मिले जो तुम से हम
तो हमें यह खबर न थी
अपनी ज़िन्दगी भी मानों
जैसे कुछ बेखबर सी थी
लौ जगी तेरे प्यार की
फिर आग कहाँ शोलों में थी
परिंदों सी उड़ती आसमानो में यूं ही
उड़ानों पर भी कोई नज़र न थी
होता कोई शौक उतरने का ज़मीं पर
सोच ऐसी की भी कोई वजह न थी
कहीं होती कोई पाबंदियां
ऐसी भी कोई डगर न थी
रुख आंधिओं के जाने न थे
पर सिवा ज़मीं के कोई ठिकाने न थे
भर देती है मस्ती ,खुशी ज़िन्दगी में
सोचा न था ,कहीं वीराने भी थे
है कहाँ जुदा ,ख़ुशी से गम
लगा इतने भी हम सयाने न थे
यह रीत तो है सदिओं पुरानी
बचने के भी कोई बहाने न थे
फिर मिले जो तुम से हम
मुश्किलों के फिर ज़माने न थे
और सिवा चरणों के तेरे
अब और कोई ठिकाने न थे
जाना हक़ीक़तों को तो लगा
कभी इतने भी हम सयाने न थे

2 Comments

  1. Anuj Tiwari"Indwar" 01/09/2015
  2. kiran kapur gulati 19/04/2017

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