ख्वाब

अपने ख्वाबों की जो खुश्बु से बिछड जातें हैं,
लोग वही दुनियां में तन्हा रह जातें हैं,
हम चले भी तो ख्वाब लिए आंखों में,
या ख्वाब ही हमें राहों में लिए जातें हैं,
ख्वाबों की तामीर में हम उठ के गिरे,
गिर के उठे और फिर चले जातें हैं,
कुछ ख्वाब लातें हैं खुशी के मंजर योगी,
कुछ आतें हैं तो रूलाके गुजर जातें हैं,

2 Comments

  1. Meharban Singh 20/08/2015
    • yogesh sharma 21/08/2015

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