अब डर लगता है फिर कुछ आगे सोचने से

अब डर लगता है फिर कुछ आगे सोचने से |
बचपन से यही सोचता था ,की यही मेरी मंजिल है जहा मुज़े पहुचना है,
मगर पहुँचते ही फिर एक नया सिलसिला शुरू ,जिसका कोई अंत नहीं,
इसीलिए अब डर लगता है फिर कुछ आगे सोचने से |

न जन्मते मेरी मर्जी थी,न मरते मेरी मर्जी,
न जन्म मेरा है,न मृत्यु मेरी,
तो इस बीच सबकुछ मेरा होने का ये कैसा भ्रम है मैंने पाला,
इसीलिए अब डर लगता है फिर कुछ आगे सोचने से |

पंछी उड़ते है आकाश में,कोई पदचिन नहीं,
हर किसी का मार्ग है अपना ,कोई किसी के पीछे नहीं,
मैं भी उड़ना चाहता हु खले आकाश मे पंछी बनकर,
मगर भाग रहा हु किसी और के मार्ग को अपना समज़कर,
इसीलिए अब डर लगता है फिर कुछ आगे सोचने से |

जो हर्षित है,लगते है पत्थर है,
जो खुश है, लगते है मुखोटे है,
जाने क्या सच छिपा है इन चेहरों के पीछे पता नहीं,
कही मैं भी इनके बीच तो नहीं,
इसीलिए अब डर लगता है फिर कुछ आगे सोचने से |

कटने पे न कोई पेड़ रोता है,
न किसी प्राणी के मर जाने पर दूसरा शोक मनाता है,
ऐसा प्रतीत होता है मनो सारी सृष्टि उत्सव मना रही हो,
मैं भी बनाना चाहता हु अपने जीवन को एक उत्सव,
पर क्यों हो जाता सोच सोच इतना व्यथित जैसे की सागर में उठती लहरे,
इसीलिए अब डर लगता है फिर कुछ आगे सोचने से |

2 Comments

  1. Ashita Parida 25/10/2015
    • pankaj charpe 26/10/2015

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