एै ज़िन्दगी तेरे चेहरे हज़ार

एै ज़िन्दगी तेरे चेहरे हज़ार

हंसाएं कभी तो
कभी रुलाये ज़ार ज़ार
समझना तुझे आसान नहीं,
कहीं होती है रुखसत,
तो कहीं लाती है बहार
दिखाती है कभी
वीराणिओ के आसार,
तूफानों से भी कभी
कराती है पार
दे देती है कभी अश्क़ बेशुमार,
लुटती है कभी प्यार ही प्यार
रह जाती हैं कभी हसरते कई,
नहीं आता फिर ज़िन्दगी में खुमार.

खेते रहते हैं कश्ती,
की उतरेंगे पार
ले जाती है कहीं और
उमंगों की धार.
हो जाता है खड़ा
कभी बेडा मंझधार,
और खेने को
नहीं मिलता पतवार

एै ज़िन्दगी तेरे चेहरे हज़ार

बीते पलों  पर
न था इख़्तियार,
आने वाले पलों का
रहता इन्तिज़ार.
बीत जाता है जीवन,
हो जैसी बहार,
नहीं आता कभी
जीवन में करार.
रहे तमन्नाओं से
कभी दिल गुलज़ार,
और खिलाये फूल
फिर बेशुमार.

यह चाहतों राहतों का है बाजार,
फिर भी चैन नहीं होता शुमार.
बहारों का हर पल रहता इन्तिज़ार,
पलों ही पलों में खो जाता संसार

एै ज़िन्दगी तेरे चेहरे हज़ार
हंसाएं कभी तो कभी रुलाये ज़ार ज़ार

3 Comments

  1. DK Nivatiya 13/08/2015
    • Kiran Kapur Gulati 16/08/2015

Leave a Reply