ख़ुद अपना लिखा मिटा रहे हैं

हुआ है कुछ यूँ कि, अब ख़ुद अपना लिखा मिटा रहे हैं
छिपकर छिपकर रोते थे, अब आँसू ख़ुद से छिपा रहे हैं।
हवाएं जो कुछ कहती थीं, दिशाएं जो कभी बहती थीं
यूँ अंजानी अनसुनी हुई हैं, कि चेहरा उनसे छिपा रहे हैं।
सड़कें जो कभी संग चलती थीं, ख़त्म हुई हैं, ठहर गई हैं
जाने क्यों कर रूठ गयी हैं, कि हाथ अब उनसे छुड़ा रहे हैं।
© राजीव उपाध्याय

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  1. Kishore Kumar Das 09/08/2015

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