हे महाप्राण

निराला तेरी गलियों में आज मैं भी घूमी हूँ,
देख तेरी प्रकृति को ,मुग्ध हुई और तुझमे हूँ।

नदी नहरे और वृक्ष ,कहते तेरी कहानी है,
महिषादल की गलियो में ,आज भी तेरी निशानी है।

बातास यहाँ बहती,साहित्य तुम्हारी कहती,
लोग तुझसे आज भी है अंजान,फिर भी यहाँ तेरी पहचान।

तेरा वह जन्म स्थल,राजबाड़ी ,विद्यालय,
गोपालजी का मन्दिर आज भी वैसा ही है।

तुम्हारी गुण गायी,प्रतिमा तुम्हारी बनवाई,
करे न कोई खुदाई ,केवल नाम कमाई।

हे महाप्राण ,हे अवढरदानी,हे मेरे प्रिय कविवर,
तेरे जैसा कोई न था,न होगा कोई यहाँ पर।

कब समझेंगे ?कब जानेंगे? लोग यहाँ के अविचल,
महिषादल के लोगो को समझाऊँगी मैं प्रतिपल।

तू था ,तू है, तू सदा रहेगा मेरे साहित्य धरा पर,
हे मेरे महाप्राण निराला तू ही तू है गुरुवर।

मेरी कलम से………

2 Comments

  1. lalit kuldeep 09/08/2015
  2. Gurpreet Singh 19/12/2015

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