वातावरण को भी नींंद अब

वातावरण को भी नींंद अब आती नहींं है
ये हवाऐंं भी गात को सहलाती नहींं हैंं

उस दरख्त को देखिए कितना उदास है
कोयल ही नहींं टिटहरी भी टहटहाती नहींं है

हर शख्स की आँखोंं मेंं बेशरम भरा है
अस्मत लुट रही है पर हया आती नहींं है

क्या आपको भी ये मौसम बदला नहींं लगता
हमको चाल इसकी तनिक भी सुहाती नहींं है

ये बेजांं दीवार भी कहतीं हैंं सब राज हमसे
वो है कि गैरोंं की गूफ्तगू बताती नहींं है

उस वादियोंं मेंं हर शाख हरे तो हैंं मगर
बसंंत मेंं भी कोंंपलोंं मेंं मोजरेंं आती नहींं हैंं

कितने अरसे हो गये हैंं गाँव से दूर हैंं हम
मिट्टियोंं से आज भी कोई सदा आती नहींं है

4 Comments

  1. sukhmangal 22/05/2015
    • sanjay kumar maurya 21/06/2015
  2. rakesh kumar 23/05/2015
    • sanjay kumar maurya 21/06/2015

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