जानते है हम

जानते है हम,
धरती सिमट रही है,
मिट रही है,
ये बिन मौसम बारिश,
सुनामी का आना,
भूकप से धरती
का हिलना,
संकेत है कि,
संभलना है हमको|
ये नए नए आविष्कार,
ये बढती जनता का भार,
सह रही धरती सारी,
कब तक झेल पायेगी ,
इस दुनिया को ,
ये धरती प्यारी |

कहते हैं हम,
ये प्राकृतिक आपदा है,
इसमें हमारी क्या,
ख़ता है|
पर क्या सच में ,
हम दोषी नहीं है,
इस सम्पदा के,
भोगी नहीं है,
फिर क्यूँ नहीं उठाते,
जिम्मेदारी,
बचा लेते धरती सारी |

बी.शिवानी

6 Comments

  1. gyanipandit 14/05/2015
    • भारती शिवानी 14/05/2015
  2. rakesh kumar 16/05/2015
    • भारती शिवानी 16/05/2015
  3. Mohit Dwivedi 16/05/2015
    • भारती शिवानी 16/05/2015

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