गीत-राम जी अब फिर धरा पर आपका अवतार हो |

राम जी अब फिर धरा पर, आपका अवतार हो |
है दशानन वध जरूरी, दैत्य कुल संहार हो ||

आज घर घर में दशानन, बन चुके हैं अनगिनत |
रूप सिय का देख कर बिगड़ी जयन्तों की नियत ||
इंद्र पुत्रों का अहं राघव तुम्हें है तोड़ना |
राम जी कोदंड धारो, तीर की फुंकार हो ||

हो रहा घननाद गर्जन, अब असह्य राघव् यहाँ |
संत सज्जन वृंद जायें, अब किधर कैसे कहाँ ?
नींव अब तो है सनातन, धर्म की हिलने लगी |
धर्म रघुनन्दन बचा लो, धर्म का उद्धार हो ||

बेर शबरी से निशाचर, छीन कर ले जायेंगें |
कालनेमी साधु बन करके अवध लुटवायेंगें ||
शीघ्र रघुनन्दन पधारो, काल कलि हुंकारता |
वेद गो ब्राह्मण बचा लो, श्रुति निगम संचार हो ||

आचार्य शिवप्रकाश अवस्थी
9582510029

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