माँ

माँ इक शब्द है
या ज़िन्दगी की वो ज़रुरत,
जिसके बिना
अंधूरे तुम अंधूरे हम,
भटकते फिर रहे होते कहीं,
किसी अनजान सी काली सड़क पे
उजालों के लिए बेचैन,
अपने ही सवालों में
उलझ के जी रहे होते कहीं

माँ इक शब्द है
या विश्वास की वो विरासत,
जिसके बिना
डरे से तुम, डरे से हम
लड़खड़ा के गिर रहे होते कहीं,
किसी गुमनाम से ऊँचे शिखर से
संभलने के लिए हर बार
अपने ही पांवो को
हज़ारों बेड़ियों से सी रहे होते कहीं….

माँ इक शब्द है
या ज़िन्दगी की वो ज़रुरत…….

(राहुल सिंह)

2 Comments

  1. rakesh kumar 23/03/2015
  2. Rahul Singh 26/03/2015

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