कुछ आँखे धुंधली-धुंधली सी अब ढूंढ़ रही अपनी मंजिल

”कुछ आँखे धुंधली-धुंधली सी
अब ढूंढ़ रही अपनी मंजिल
भूल गए कब हुआ सबेरा
कब आती है शाम निराली
खोज रही उन पथो पे
उम्मीदों का वो दर्पण
जिनपे ढलता सूरज है
और स्थिरता की होती शाम कभी
निज मान और सम्मान की
डोर होती खोखली सी
कुछ आँखे धुंधली……
कंधे जिन पे खेलकर
सपने हुए थे गुलजार कभी
आज टूटी हुई डाली सी
बिखरी पड़ी है प्याली सी
करती है उम्मीदे
खुद के लिए सहारो की
मद में चूर हुई उन शाखाओ से
जो रोशन हुई इन बाग़ों में
और खो गयी है जाने किन वादो में |”

2 Comments

  1. sukhmangal 04/03/2015

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