अरसे के बाद ( ग़ज़ल )

अर्शे के बाद ( ग़ज़ल )

गुमराह हुआ बहुत महफ़िल ऐ जिंदगी दर-बदर !
फिर चला आया हु तेरी नजर एक अरसे के बाद !!

चाह तो था बहुत दूर रहना तेरी नजरो से मगर !
गिरफ्तार किया गुस्ताख़ अदा ने अर्शे के बाद !!

नज़र अंदाज़ करते रहे ताउम्र जिस ज़लाल से !
फिर चढ़ा नशा तेरी रवानी का एक अरसे के बाद !!

गमजदा रहा सदा खस्ताहाल घनेरे बादलो निम !
फिर सुलगी उमंगो की माचिस एक अरसे के बाद !!

जिस रब को खोजता रहा मंदिर, पीरे, मजार !
मन के आशियने में आज समाया अर्शे के बाद !!

जिस के होने के अहसास से मचल उठती थी हवा !
उसकी खुसबू से महक उठी रूह एक अरसे के बाद !!

क्या सोचता धर्म की तुमने छोड़ा या गवाया तुझे
फिर उस ने की ख्वाहिश मिलने की अरसे के बाद !!
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डी. के. निवातियाँ [email protected]@@

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शब्दकोष :-
दर-बदर = दर दर की ठोकरे खाना
गुस्ताख़ = मर्यादा विरुद्ध
ज़लाल = अवगुण
रवानी = प्रवाह
गमजदा = दु:ख, चिन्ता
ख़स्ताहाल = टूटा हुआ, जरजर,
निम = मध्य

6 Comments

  1. निवातियाँ डी. के. 05/02/2015
    • निवातियाँ डी. के. 02/03/2015
  2. बन्टी "विकास" माहुरे 09/02/2015
    • निवातियाँ डी. के. 02/03/2015
  3. Karma Vaahini 16/11/2017

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