कैसे नया साल मान लूँ

यूँ ठहरा है वक्त वहीं, कुछ भी तो नया नहीं होता।
सोच बदले तो सब बदले, कुछ यूँ ही नया नहीं होता।।
वो ही छीना-झपटी, दौड़-भाग, कैसे कहूँ कुछ बदल गया।
कितने सारे वर्ष हैं निकले, ये वर्ष भी निकल गया।।
उपद्रवी सारे सबल यहाँ, अबला अब भी अबला है।
कैसे कह दूँ नारी को, साल में कुछ भी बदला है।।
नया वर्ष तब ही होगा, जब नये विचार लहराएंगे।
आगे की पीढ़ी में जन-जन, राम, कृष्ण जन पाएंगे।।

अरुण जी अग्रवाल

6 Comments

  1. कवि अर्पित कौशिक 02/01/2015
  2. अरुण जी अग्रवाल 05/03/2015
  3. vaibhav.negi 06/03/2015
  4. अरुण जी अग्रवाल 07/03/2015
  5. vaibhavk dubey 07/03/2015
  6. अरुण जी अग्रवाल 07/03/2015

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