परम्परावादी हुँ………. परम्पराये निभा रहा हुँ

परम्परावादी हुँ,
इसलिए परम्पराये निभा रहा हुँ
जिंदगी को समझा नही,
फिर भी जिए जा रहा हूँ

मैं अकेला नहीं इस दुनिया में
हाल सबके एक जैसे देखे मैंने
मन से विचलित रहता हूँ, बस
काया माया से मंदिर जा रहा हुँ

सब कुछ रखता हुँ मैं
शान -ऐ- शौकत के लिए
न जाने फिर भी क्यों
अंतर्मन से सदा कंगाल रहा हूँ

हुक्म चलता है मेरा जमाने में
नाचते है सब बन कठपुतली से
इतना शक्तिशाली हूँ पर फिर भी
सदा वक़्त के हाथो पिसता रहा हुँ

अर्थविहीन होकर कार्लचक्र में
आदमज़ाद हर शै: से चला बेखबर
यथोचित हुँ या बेजा पता नही कुछ
बस घुड़दौड़ में संग-संग दौड़ रहा हुँ

निभाता हुँ सभी रस्मे अदायगी
हो बेखबर, बेखौफ, बेपरवाह
चली आ रही जो परम्परा सदियों से
निरर्थक स्वंय को घसीटे जा रहा हूँ

निकला है हर कोई तलाश मैं
जिस शांति पथ की, मिलेगा वो,
स्वत:विश्लेषण में, ये जानता हुँ
फिर दिखावे को बरबस लुभा रहा हुँ

परम्परावादी हुँ,
इसलिए परम्पराये निभा रहा हुँ
जिंदगी को समझा नही अब तक,
“धर्म” फिर भी जिए जा रहा हूँ

डी. के, निवातियाँ [email protected]@@

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