मुर्दों पर कोई भी

जी भरकर जोड़ लो
बोर सिक्कों के तुम
तेरा वजीर अय्यास है
बिलकुल नहीं समझता

देखकर रसूक को
ईमाम बन बैठें हैं
कोई धर्म नहीं समझता
कोई ईमान नही समझता

पाने को दो गज जमीन
कूबत रख दरमियाँ
जो गुजर गया वो
फिर से नहीं पलटता

कफ़न मे भी जेबें
होती नहीं साथी
यमदूत भी लेना
रिश्वत नहीं समझता

समझ में आएगा जब
खोखला हो चुका होगा तू
मुर्दों पर कोई भी, दोस्त
चन्दन नहीं रगड़ता

2 Comments

  1. abhaykumaranand 26/12/2014
    • rakesh kumar 27/12/2014

Leave a Reply