दंगल में

आओ ना संग बैठकर
जिंदगी बनाएं हम
आड़ी तिरछी लकीरों को
जिधर चाहें घुमाएं हम

बड़ी भाग दौड़ की है
लेकर बोझ किताबों का
आओ खुद को खुली
धुप में सुखाएं हम

छिटकती हैं कलियाँ रोज़
जरूरतों के हंटर से
इस चमकते बाज़ार में
दिल का मोल लगाएं हम

सिसकता ही रहा मन मेरा
समझदारों के दंगल में
आओ ना इन खंडहरों को
फिर से घर बनाएं हम

2 Comments

  1. अरुण जी अग्रवाल 09/12/2014
    • rakesh kumar 09/12/2014

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